कल मायावती कि महारैली में न केवल प्रदेश सरकार बल्कि,प्रत्यछ या परोछ रूप में रेलवे और परिवहन निगम का भी योगदान था.
इस प्रदेश कि उस जनता का जो केवल कागजो में ही सुख सुविधा देख पाती है के ,२०० करोड़ कि गाढ़ी कमाई से आयोजित इस रैली का आरोपों प्रत्यारोपो के अलावा आखिर निष्कर्ष क्या था?
मुख्यमंत्री ने बस कुछ नेतावो के साथ ही बाबा रामदेव को भी नहीं बख्सा.उनका का कहना है कि,मात्र कुल बजट का,१% ही मूर्तियों पे खर्च किया गया है.इतना ही नहीं कयास लगाया जा रहा है कि,५०,०००,१०००-१००० के नोटों कि माला के साथ बसपा प्रमुख का स्वागत किया गया .
आज जबकि प्रदेश में ,भ्रस्ताचार,अपराध और बेरोजगारी ने वर्चास्वा स्थापित किया हुआ है,ऐसे में इस रैली का क्या औचित्य था.
जिस बाबा रामदेव पर वो आरोप लगा रही है,कि, वो राजनीती में आना चाह रहे है,उनके तो नाम पर सुई के नोक बराबर भी जमीन नहीं है कही पर भी.करोडो लोगो के मानसिक और शारीरिक स्वाश्थ्य का उपचार करके बाबा ने जो परमार्थ का काम किया है,वो करोडो नेता मिल कर भी कभी भी नहीं कर सकते है.
क्यों कि बाबा के पास जनाधार तो अपरमपार है,परोपकार अद्वितीय,तो फिर बाबा किस इहलौकिक सुख कि इछा से नेता बनाना चाहेंगे?
सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय का नारा देने वाली,इस पार्टी अध्यक्षा को चाहिए कि,पहले सिर्फ १ बार आम आदमी कि तरह लोगो के घरो में जंक कर,देखे तो शायद पता चले कि उन्हे कोरी सहानुभूति नहीं रोटी रोजगार रोकड़ा कि जरूरत है.मेरी समझ में तो इस आयोजन का औचित्य समझ में नहीं आता है आपको मालूम हो तो कृपया इस मूढ़ को बताने का कष्ट करे.
किसी भी त्रुटी के लिए छमा प्रार्थनीय है.
आपका सुभेच्छु -
सिद्धांत.
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